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मौत के सौदागरों पर ‘सैंपल’ वाली मेहरबानी: क्या इंदौर जैसी त्रासदी का इंतज़ार कर रहा है प्रशासन?

कागजों पर 'शुद्ध', हकीकत में 'अशुद्ध': जिले की पानी फैक्ट्रियों में मानकों की धज्जियां, जिम्मेदार मौन।

अजीत मिश्रा (खोजी)

प्रशासनिक सुस्ती और प्यास का व्यापार: जब जान पर बन आती है, तभी क्यों जागता है तंत्र?

मंगलवार 20 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। कहते हैं ‘जल ही जीवन है’, लेकिन आज के दौर में यह जुमला ‘जल ही व्यापार है’ में तब्दील हो चुका है। हाल ही में बस्ती जिले में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की टीम ने आधा दर्जन पानी पैक करने वाली फैक्ट्रियों पर छापेमारी की। विभाग की इस “सक्रियता” ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सीधे तौर पर आम जनता की सेहत और प्रशासन की कार्यशैली से जुड़े हैं।

💫इंदौर की घटना का इंतज़ार क्यों?

रिपोर्ट के मुताबिक, यह कार्रवाई इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों और बीमारी के बाद शुरू हुई है। सवाल यह है कि क्या हमारे स्थानीय प्रशासन को किसी बड़े हादसे का इंतज़ार रहता है? क्या बस्ती के नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए इंदौर की त्रासदी एक ‘अलार्म क्लॉक’ थी? नियमतः यह जांच एक सतत प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि किसी बाहरी घटना पर आधारित ‘रिएक्टिव’ कार्रवाई।

💫खामियां नहीं, ये ‘सफेदपोश अपराध’ हैं

जांच में पैकिंग यूनिटों के पास रिकॉर्ड अपडेट न होना, लेबलिंग में गड़बड़ी और साफ-सफाई का अभाव पाया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिले की 9 चालू इकाइयों में से 3 बंद मिलीं और कई मानक पूरे नहीं कर रही थीं। बोतल बंद पानी हम इसलिए खरीदते हैं क्योंकि हमें सरकारी सप्लाई पर भरोसा नहीं होता, लेकिन अगर 20-25 रुपये खर्च करने के बाद भी हमें बीमारियों का ‘कॉकटेल’ मिले, तो इसे सिर्फ ‘खामी’ कहना गलत होगा। यह जनता के भरोसे के साथ किया जा रहा आपराधिक खिलवाड़ है।

केवल नोटिस और चेतावनी ही क्यों?

प्रशासन ने सुधार के लिए चेतावनी देकर और सैंपल लैब भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। लेकिन क्या यह काफी है?

जब तक लैब की रिपोर्ट आएगी, तब तक हज़ारों लीटर संदिग्ध पानी जनता के पेट में जा चुका होगा।

क्या इन इकाइयों के खिलाफ लाइसेंस रद्दीकरण या भारी जुर्माने जैसी कठोर कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी?

बिना पुख्ता मानकों के ये फैक्ट्रियां आखिर इतने समय से चल कैसे रही थीं?

💫जवाबदेही तय होनी चाहिए

महज दिखावे की छापेमारी से व्यवस्था नहीं सुधरती। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘फूड सेफ्टी’ सिर्फ फाइलों का विषय न रहे। पानी बेचने वाली हर इकाई की सघन और नियमित निगरानी हो। जनता को भी सजग होने की ज़रूरत है—अगर बोतल पर आईएसआई (ISI) मार्क या एक्सपायरी डेट स्पष्ट नहीं है, तो उसे सिरे से नकारें।

प्रशासन याद रखे, प्यास बुझाना उसका दायित्व है, और पानी के नाम पर ज़हर परोसने वालों को संरक्षण देना उसकी विफलता।

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